क्या मोदी सरकार का नया कानून खत्म कर देगा खोजी पत्रकारिता? 21 मीडिया संस्थान पहुंचे अदालत*
केंद्र सरकार के नए कानून के खिलाफ देश के 21 बड़े मीडिया संस्थानों ने मोर्चा खोल दिया है। मामला अब कोर्ट में है। सवाल है – क्या ये कानून देश में Investigative Journalism का अंत है?
मोदी सरकार द्वारा लाया गया नया मीडिया/डिजिटल कानून अब विवादों में है। इस कानून में ऐसे प्रावधान हैं जो सरकार को खबरों पर सीधे नियंत्रण, कंटेंट हटाने और पत्रकारों व संस्थानों पर भारी जुर्माना व कार्रवाई का अधिकार देते हैं।
मीडिया संगठनों का आरोप है कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा हमला है।
इस कानून के खिलाफ देश के 21 प्रतिष्ठित डिजिटल न्यूज पोर्टल, समाचार पत्र समूह और पत्रकार संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
याचिका में कहा गया है:

1. ये कानून सरकार को “फेक न्यूज” की परिभाषा तय करने और उसे ही जज बनने का अधिकार देता है।
2. इसमें इंटरमीडियरी नियमों के नाम पर न्यूज रूम में सरकारी दखल बढ़ेगा।
3. छोटे और स्वतंत्र मीडिया हाउस जो सरकार से सवाल पूछते हैं, उन्हें इस कानून से सबसे ज्यादा निशाना बनाया जाएगा।
4. अगर कानून रहा, तो राफेल, पेगासस, इलेक्टोरल बॉन्ड और अदानी जैसे मामलों की तरह कोई भी बड़ी खोजी रिपोर्ट दोबारा सामने नहीं आ पाएगी।
सरकार का कहना है कि यह कानून फेक न्यूज और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। लेकिन प्रेस क्लब ऑफ इंडिया से लेकर एडिटर्स गिल्ड तक ने कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पत्रकारिता को खत्म नहीं किया जा सकता।
अब सबकी निगाहें अदालत पर हैं। फैसला तय करेगा कि भारत में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ स्वतंत्र रहेगा या सरकारी प्रेस रिलीज तक सिमट जाएगा।
आइए जानते है,
भारत का डेटा प्रोटेक्शन एक्ट *Digital Personal Data Protection Act, 2023 (DPDP Act) आखिर है क्या, तो बता दें कि इस एक्ट को इसे 11 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी।
ये कानून भारत में पहली बार पर्सनल डेटा की सुरक्षा के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा बनाता है।
मुख्य बातें:
*1. किस पर लागू होता है:*
– भारत में रहने वाले किसी भी व्यक्ति (Data Principal) का डिजिटल डेटा
– चाहे वो डेटा ऑनलाइन लिया गया हो या ऑफलाइन लेकर डिजिटल किया गया हो
*2. दो मुख्य पक्ष:*
– *Data Fiduciary:* जो कंपनी/सरकार आपका डेटा लेती है (जैसे Google, Amazon, बैंक)
– *Data Principal:* आप, यानी जिसका डेटा है
*3. कंपनी की जिम्मेदारियां:*
– डेटा सिर्फ उसी काम के लिए लेना जिसके लिए आपकी सहमति ली है
– साफ-साफ बताना कि डेटा क्यों ले रहे हैं
– डेटा को सुरक्षित रखना, लीक होने पर Data Protection Board को बताना
– सहमति वापस लेने का आसान विकल्प देना
*4. आपके अधिकार:*
– अपने डेटा की जानकारी मांगने का हक
– डेटा को सही करवाने, मिटाने (Right to Erasure) का हक
– शिकायत करने का हक
– नॉमिनी बनाने का हक
*5. सरकार को छूट:*
राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के लिए सरकार कुछ शर्तों में डेटा प्रोसेस कर सकती है।
*6. सजा:*
नियम तोड़ने पर ₹50 करोड़ से लेकर ₹250 करोड़ तक का जुर्माना। इसके लिए *Data Protection Board of India* बनाया गया है।
*7. बच्चों का डेटा:*
18 साल से कम उम्र के बच्चों का डेटा लेने से पहले माता-पिता की सहमति जरूरी है, और बच्चों का डेटा ट्रैकिंग/टारगेटेड विज्ञापन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
सिंपल में कहें तो – अब कोई भी कंपनी आपका डेटा बिना बताए नहीं ले सकती, और अगर डेटा लीक हुआ तो जिम्मेदारी कंपनी की होगी, आपकी नहीं।इस एक्ट को लेकर पत्रकारिता से जुड़े संस्थान सरकार के खिलाफ़ है|
DNPA (Digital News Publishers Association) ने इस कानून के खिलाफ Supreme Court में याचिका दायर की है। DNPA में 21 बड़े मीडिया हाउस हैं – जैसे The Hindu, Times of India, Indian Express, India Today, NDTV, Network18 आदि।
Supreme Court ने 27 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 17 नवंबर को रखी है।
*DNPA का मुख्य विरोध:*
*1. पत्रकारिता के लिए कोई छूट नहीं:* कानून में Investigative Journalism के लिए कोई स्पष्ट exemption नहीं है। DNPA का कहना है कि इससे प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में है।
*2. Consent का नियम:* अगर किसी व्यक्ति की जांच करनी हो, तो रिपोर्टर को पहले उसका consent लेना पड़ेगा। DNPA का तर्क है कि इससे जांच के बारे में पहले ही पता चल जाएगा और सबूत मिटाए जा सकते हैं, गवाहों को प्रभावित किया जा सकता है।
*3. Data Erasure का डर:* कानून किसी भी व्यक्ति को अपना डेटा हटाने (Right to Erasure) का अधिकार देता है। DNPA को डर है कि इसका इस्तेमाल करके लोग सच्ची खबरों को भी हटवाने का दबाव डालेंगे।
*4. सोर्स गोपनीयता खतरे में:* सरकार डेटा हैंडल करने वालों से जानकारी मांग सकती है, जिससे पत्रकारों के गुप्त सूत्र (Whistleblowers) उजागर हो सकते हैं।
*5. RTI पर असर:* DNPA ने Section 44(3) को भी चुनौती दी है, जो कहता है कि हर तरह की personal information RTI में नहीं दी जाएगी। उनका कहना है कि इससे सरकारी अधिकारियों के बारे में जानकारी मिलना मुश्किल हो जाएगा और 20 साल से चला आ रहा Privacy और Right to Information का संतुलन टूट जाएगा।
DNPA की वकील माधवी दीवान ने कोर्ट में कहा – _”अगर मुझे डेटा प्रिंसिपल की मर्जी पर निर्भर रहना पड़ा कि वो consent देगा या नहीं, तो खबर कैसे रिपोर्ट होगी? इससे न्यूजरूम बंद हो जाएंगे।”_


